मानस की चौपाई हैं या , अतीत लिखी कथाएं हैं
तुलसी आंगन बिरवा हैं माँ, या वेद की ऋचाएं हैं ।
श्वास मलय सौरभ शीतल है, मंद मंद समीर झोंका
सप्तरंगी वर्तिका अंतस, खिंच इंद्रधनुष झरोखा
भाग्य हाथ लिख संजोती तू, स्वर्णिम भविष्य हो मेरा
यों लगे कांति भुवन भानु की, उदित हुआ नया सबेरा ।
देवलोक दीप्त सलिल प्रवाह, गुंजित दसों दिशाएं हैं
तुलसी आंगन बिरवा हैं माँ, या वेद की ऋचाएं हैं ।
माँ तेरा रूप अविनि अम्बर, ज्योर्तिपुंज सा दमक रहा
वात्सल्य तेरा पारिजात, क्षितिज मिलन पर चमक रहा
माँ त्रिपिटिक के सिद्ध सूक्त सी, है तू गीता की वाणी
सप्तसिंधु नीर भरी कलसी, धो पद पूजूँ कल्याणी ।
केसर चंदन रोली वंदन, मंगल प्रीत हवाएं हैं
तुलसी आंगन बिरवा हैं माँ, या वेद की ऋचाएं हैं ।
तू कविता की सहज वेदना, काव्य में ढली काया सी
स्पर्श गंध पुष्प का अनुबंध, अद्भुत ममता माया सी
प्रवाह प्रीत स्नेह सागर का, गंगा की निर्मल धारा
ममता की मानसरोवर माँ, या शिल्पी सर्जन कारा ।
वेदों की मूल चेतना है, उर्जित उष्ण शिराएं हैं
तुलसी आंगन बिरवा हैं माँ, या वेद की ऋचाएं हैं ।
बोल मधुर गूंजती शिंजनी, नर्तन मन परिमेय गहे
कहाती कल्पना ईश्वर की, हर्षित सिंचित हृदय रहे
सर्वस्नात मूरत मन बसती, धन्य पुण्य जीवन मेरा
गूंज मंदिर की घंटियों में, आरती है मनन तेरा ।
यमुना की श्याम लहर पावन, चंचल चंद्र कलाएं हैं
तुलसी आंगन बिरवा हैं माँ, या वेद की ऋचाएं हैं