अन्तराकाश शून्य निरन्तर, चेतन तरंग जगाता है
स्मृति-दीप की सूक्ष्म प्रभा से, बोध पुन: झिलमिलाता है
क्षणभंगुर जग-गति के भीतर, शाश्वत तत्व गाता है
मातृकृपा का सूक्ष्म स्पन्दन, प्राणों में बस जाता है
जीवन मिथ्या दृश्य प्रतीति, तुमने बोध कराया था
अहं क्षीण कर बीज जगाया, सत्य मार्ग दिखलाया था
मोह आवरण हटते ही फिर, आत्म प्रकाश जगाता था
मातृसंस्कारों का निर्झर, अन्तर में बह जाता था
संस्कारित चेतन के भीतर, ऋत का नाद सुनाती थी
धैर्य धरा सा, करुणा नभ सी, दृष्टि विशद कर जाती थी कर्म पथिक को नियति द्वार तक, साधक नित पहुँचाता था
मातृवाक्य का सूक्ष्म उपांशु, आलोकित कर जाता था
काल प्रवाह अनवरत रह पर, ऋत तत्त्व न क्षीण हुआ है
तुम्हारी दी हुई प्रज्ञा का ही, दीप अभी अभी जला है
नश्वर देह विलीन हुई पर, भाव अमर रह जाता है
मातृचेतना का वह स्पर्श, जीवन अर्थ बताता है
पुण्य तिथि का यह शांत निमेष, पुनः चिन्तन जग लाया
तर्पण बन कर शब्द समर्पित, अन्तर्मन है झुक आया
जन्म ऋणानुबंध स्मरण कर, चित्त नमित हो जाता है
मातृसत्ता का सूक्ष्म अधिष्ठान, चेतन में छा जाता है