कम्बख़्त ये दिल, बार-बार तुम्हें ढूँढ लेता है,
कम्बख़्त ये दिल, तुमसे दूर रहकर भी तेरी राहें पकड़ लेता है।
कभी हँसता है, कभी चिल्लाता है — पर तुम सुन नहीं पाती,
और मैं चुप रह कर भी हर पल तुम्हें पुकारता हूँ।
तुम्हारी याद कभी मिठास बन कर आती है, कभी जहर,
मुझे जिंदा रखने के लिए वही एहसास काफी है।
मैं जानता था मोहब्बत आसान नहीं, फिर भी गहरा गया,
और अब उस गहराई का पानी मेरे ऊपर गिरता रहता है।
तुम्हारे बिना भी मैंने तुझे अपना कर लिया, पर क्या फ़ायदा?
क्योंकि तुम मेरी हँसी की वजह नहीं रहीं।
फिर भी जब हवा चलती है, तेरी ख़ुशबू मेरे पास आती है,
और मैं सोचता हूँ — शायद कहीं तुम भी मुझे याद करती हो।
कम्बख़्त ये दिल हर बार नया जख्म खाता है,
पर तेरे लिए जिए बिना भी तेरे ही ख्वाब सजाता है।
तुम्हें भूलना मेरे बस की बात नहीं — और यही मेरी सज़ा है,
कम्बख़्त ये दिल फिर भी तुझसे मिलने की तमन्ना जलाये रखता है।