आँखों में बसा अक्स तुझसा, पर बोलता कुछ नहीं,
होंठ चुप हैं पर दिल की कुहनी कभी-कभी चोट खाती है।
तुमने कहा था — चलो साथ चलते हैं, पर रास्ता बदल गया,
अब मैं उन राहों पर अकेला घर बसाता हूँ।
तुम्हारी तस्वीर नहीं, पर तेरी झलक आँखों में रहती है,
और जब मैं देखता हूँ, तो दिल मेरा थिरक जाता है।
कभी सोचता हूँ — क्या गलत हुआ हमारी दास्ताँ में?
पर जवाब हवा में खो जाता है, और मैं फिर से रोता हूँ।
रातों की नींद अब किताबों में मिलती है, पर कहानी अधूरी,
सुबह के फोन अब खामोश हैं, तेरी आवाज़ का इंतज़ार फीका।
मैंने हर पल तेरा नाम उस्मान किया, पर वो पल लौट कर नहीं आते,
आँखों में बसा अक्स ही मेरी तस्लीम है — तुम रहोगी हमेशा।
आँखों में बसा अक्स तुझसा — यह मेरी शांति है,
तुम चली गयी, पर तेरे अक्स ने मुझे जिया रखा।
शायद मैं किसी और की बातों में खो जाऊँ, पर ये अक्स रहेगा,
क्योंकि तुम्हारे बिना भी मेरी आँखें तुम्हीं की तस्लीम करेंगी।