जो उजाला था इस घर का मेरे तुट गया वो रोशनदान
खंडर है हर कोना यहां हुआ करता था आलीशान
हर फूल खिला था बागीचे में अब कांटो का है मैदान
तितलियों की टोली बेघर हुई कुछ चिंटियो का है मकान
चुमती थी जिन होंठो को तुम वो ढूंढ़ते रहते है जाम
ये चहेरा जो प्यारा था तुझे देख आयना भी है अंजान
सच लगता था मुझे हर लफ़्ज़ तेरा गलत हुआ अनुमान
जिनको छोड़ तुझे था पाया सजाते है वहीं हर शाम
तब तू था सिर्फ तू था अब में ही में हूं सुबह शाम
है मेय के नशे में गम ए इश्क और धुएं में अरमान।