मुझसे मत पूछ, मैं कौन हूँ...
मैं एक आवाज़ हूँ, जो खामोश है मगर ज़िंदा है।
मेरे भीतर कुछ ऐसा है, जो दुनिया से अलग है...
मेरी सोच... सिर्फ़ सोच नहीं, एक तपस्या है।मेरी सोच में अंधेरा भी है, उजाला भी,
मैं अंदर से जला हूँ, बाहर से हूँ ख़ामोशी की माला सी।
ज़िंदगी ने थप्पड़ मारे, मगर मैं मुस्कुराता रहा,
अब ख़ुशी भी लगती है जैसे कोई उधार की साला सी।
मैं वो आँसू हूँ जो चुपचाप गिरते हैं,
मैं वो सच हूँ जो सपनों की किताबों में लिखते हैं।
गलियों में भटका, इस भीड़ में खोया,
पर आत्मा बोली – “तू ख़ुद को मत छोड़ यारा।”मैं ढूंढता रहा भगवान को मंदिर की दीवारों में,
पर उसने कहा – “तू ही है, देख अपने विचारों में।”
मैं पत्थर तोड़ता रहा, रास्ता बनाने के लिए,
महाकाल बोले – “यही है तेरा असली विद्यालय रे।”रिश्तों की भीड़ थी, पर सबने चेहरे ओढ़ रखे थे,
मैं सच बोल बैठा, और वो मुझसे डर के भागे थे।
दिल में उठते थे सवाल – क्यों मैं? क्यों ये दर्द है?
एक साधु मिला, बोला – “बेटा, ये तो तेरा कर्म है।”
अब मैं शांत हूँ, बैठा हूँ धूनी के धुएं में,
त्रिशूल पकड़ बोला – “अब मैं हूँ अपने जुनून में।”
मुझे न नाम चाहिए, न झूठी तालियाँ,
मुझे बस अपनी आत्मा से मिलनी थी, और चल पड़ी मेरी काव्य यात्राएँ।ये रैप नहीं, मेरी आत्मा का गीत है,
हर शब्द में एक रूहानी प्रीत है।
मृत्यु भी जब आएगी तो झुककर बोलेगी –
“तू तो वो सोच था, जो शिव के मन से उपजी रीत है।”