एक सरकारी स्कूल के पीछे, रोज़ एक छोटी सी बच्ची कूड़ेदान के पास बैठी रहती थी —
उसका नाम था चांदनी।
वो स्कूल की नहीं थी, लेकिन रोज़ बच्चों को क्लास में जाते हुए देखती थी।
उसकी आँखों में एक ही सवाल रहता —
“काश… मैं भी पढ़ पाती।”
एक दिन, स्कूल की छुट्टी के बाद उसने देखा —
कूड़ेदान में एक टूटी हुई पेंसिल पड़ी है।
उसने उसे उठाया, साफ़ किया, और मिट्टी पर अक्षर बनाने लगी —
“अ… आ…”
हर दिन वो वहीं बैठकर खुद को पढ़ाती।
कभी-कभी मास्टर जी खिड़की से देखकर मुस्कुराते —
लेकिन कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते,
“अरे ये तो कूड़ेदान वाली लड़की है!”
वो कुछ नहीं कहती… बस मुस्कुराकर फिर वही पेंसिल चलाने लगती।
साल बीतते गए —
वो लड़की बड़ी हुई, और उसी स्कूल में टीचर बनकर लौटी 🍎
पहले दिन उसने बच्चों से कहा —
“बच्चों, आज मैं आपको अपनी पहली किताब दिखाना चाहती हूँ।”
उसने बैग से एक पुरानी टूटी हुई पेंसिल निकाली।
बोली —
“कभी-कभी ज़िंदगी सबसे कीमती चीज़ें कूड़ेदान में नहीं, अपने जज़्बे में छुपा देती है।”
“हालात चाहे जैसे हों, अगर सीखने की चाह हो, तो मिट्टी भी किताब बन जाती है।”
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