सपनों का झोला कंधे पे डालूँ,
राहों में हर मुश्किल से टकराऊँ।
दिल की धड़कन कहती है मुझसे,
“हार न मान, बस चलते ही जाऊँ।”एक छोटे से गाँव में रामू नाम का गरीब किसान रहता था। उसके पास बस दो बैल और आधा एकड़ ज़मीन थी। घर में बूढ़ी माँ, पत्नी सीता और दो छोटे बच्चे थे। मेहनत बहुत करता था लेकिन उसकी फसल से घर का खर्चा ही मुश्किल से चलता था।
गाँव में एक और किसान था – लालचू साहूकार। वह गाँव के गरीब किसानों को कर्ज़ देता और फिर ब्याज बढ़ाकर उनकी ज़मीन हड़प लेता। सब उससे डरते थे।
एक दिन रामू खेत में हल चला रहा था कि अचानक उसकी हल की नोक किसी लोहे की संदूक से टकराई। रामू ने मिट्टी हटाई तो देखा कि संदूक में सोने-चाँदी के सिक्के भरे हुए थे। उसकी आँखें चमक उठीं, क्योंकि इतने सिक्कों से वह अपने बच्चों को पढ़ा सकता था, घर बना सकता था, और सारी गरीबी मिट सकती थी।
लेकिन तुरंत ही उसके मन में एक और आवाज़ आई –
“यह खज़ाना मेरा नहीं है, ज़रूर किसी और का होगा। अगर मैं इसे रख लूँ तो यह चोरी होगी।”
रामू ने संदूक उठाकर गाँव के मुखिया के पास पहुँचा और बोला –
“मुखियाजी, यह खज़ाना मेरे खेत से निकला है। लेकिन मैं इसे अपना नहीं मानता। आप बताइए, इसका क्या करना चाहिए।”
गाँव वाले हैरान रह गए। किसी और के हाथ में होता तो वह गुप्त रूप से सारे सिक्के रख लेता, लेकिन रामू ने सबके सामने सच्चाई स्वीकार कर ली।
इसी बीच गाँव का साहूकार लालचू आगे आया और बोला –
“यह संदूक मेरा है! सालों पहले खो गया था। अच्छा हुआ मुझे वापस मिल गया।”
गाँव वाले शक में पड़ गए। किसी को याद नहीं था कि लालचू ने कभी ऐसा खज़ाना खोने की बात की हो। मुखियाजी ने कहा –
“ठीक है, अगर यह सचमुच तुम्हारा है तो बताओ, संदूक में कितने सिक्के हैं?”
लालचू घबराकर बोला –
“उ…उह… शायद सौ या डेढ़ सौ होंगे।”
मुखिया ने संदूक खुलवाया तो उसमें तीन सौ सिक्के निकले। लालचू झूठ में पकड़ा गया। वह चुपचाप खिसक गया।
तभी मुखियाजी ने सबके सामने कहा –
“रामू, यह खज़ाना किसी को नहीं पहचानता। लेकिन तुमने इसे छिपाया नहीं, बल्कि ईमानदारी से गाँव को सौंप दिया। इसलिए यह खज़ाना अब तुम्हारा है। यह तुम्हारी ईमानदारी का इनाम है।”
रामू की आँखों से आँसू निकल आए। गाँव वालों ने तालियाँ बजाईं। उस दिन से रामू के जीवन में खुशहाली आ गई। उसने बच्चों को पढ़ाया, माँ के इलाज करवाए और गाँव की मदद के लिए भी कुछ सिक्के दान किए।
मिट्टी की खुशबू साथ है मेरे,
पग-पग पे आशीर्वाद हैं तेरे।
गिर कर उठना है आदत पुरानी,
हर चोट से मिलती ताक़त कहानी।
उड़ना है, उड़ना है, सपनों के आसमान,
कल जो था अधूरा, आज बने पहचान।
दिल की ये आवाज़ है, सुन ले ज़माना,
मैं लिखूँगा अपनी तक़दीर का फ़साना।