मैं हूँ लंगर की ज़ुबान, मेरा नाम राजू सादगी मेरी पहचान
भूखों के आगे झुकता नहीं, देता हूँ सच्चा सम्मान
जिसने जोड़ा दिलों को, उसके नाम की है शान
रोज़ के इस उजाले में, बनता मेरा हर अरमान
मैं देता हूँ, जो बन पाए, पर दिल से कम नहीं
किसी ने पंगा नहीं, यहाँ नफ़रत का दम नहीं
हमने सीखा बाँटना, यही है अपना धर्म
साथ चले तो रास्ते, लगते हैं जैसे मरहम
मोजे अगोली की बातों में, तकरार का रंग नहीं
हमने रोटी में रखा है, किसी का भी संग नहीं
माटी की खुशबू सी है, मेरे बोलों की रवानी
खाली हाथों को मिले बस, उम्मीदों की मेहरबानी
भीड़ में भी शांत रहूँ, यही मेरी असली धुन
कड़वी बातों से दूर रहकर, बढ़ता जाता हर जुनून
मैं देता हूँ, जो बन पाए, पर दिल से कम नहीं
किसी ने पंगा नहीं, यहाँ नफ़रत का दम नहीं
हमने सीखा बाँटना, इस्लाम यही है अपना धर्म
साथ चले तो रास्ते, लगते हैं जैसे मरहम
अगर कोई आए तूफ़ाँ बनकर, मैं पत्थर भी नहीं
मैं बस एक लफ़्ज़ में कह दूँ, यहाँ बैर का घर नहीं
राहत की हर थाली में, बस प्यार ही प्यार रहे
और हर थके हुए चेहरे पर, नई सी मुस्कान रहे
मैं हूँ लंगर की ज़ुबान, सादगी मेरी पहचान
किसी ने पंगा नहीं, बस रहे इंसानियत की जान