काँच की इन ऊँची दीवारों के साए में
ढूँढता हूँ खुद को मैं, अनकही सी राहों में
भीड़ है हज़ारों की, चेहरा पर कोई नहीं
बातें हैं बहुत दिल में, पर सुनने वाला कोई नहीं।
ये अजनबी रास्ते, ले जा रहे कहाँ?
जहाँ धुआँ ही धुआँ है, और खोया आसमान
खुद से ही मिलूँ, अब ऐसी कोई शाम हो
मेरे ही दिल में, थोड़ा सा तो मेरा नाम हो।
यादों की वो पोटली, जो घर पे छोड़ आए थे
मिट्टी की वो खुशबू, जो पीछे छोड़ आए थे
यहाँ चमक तो बहुत है, पर सुकून का पता नहीं
जीत तो रहे हैं सब, पर कोई हँसता नहीं।
ठहर जा ऐ वक़्त, ज़रा सा रुक भी जा
दौड़ते इन पैरों को, ज़रा सा झुकने दे
सितारों की ज़रूरत नहीं, बस एक दिया जला दे
मंज़िल न सही, मुझे मुसाफिर ही बना दे।
थोड़ा सा मेरा नाम हो...
इन अजनबी रास्तों पे...
कहीं तो घर मिलेगा...
ये अजनबी रास्ते, ले जा रहे कहाँ?
जहाँ धुआँ ही धुआँ है, और खोया आसमान
खुद से ही मिलूँ, अब ऐसी कोई शाम हो
मेरे ही दिल में, थोड़ा सा तो मेरा नाम हो।