(धारा 1 – कहानी की शुरुआत)
रात का सन्नाटा, गलियों में खामोशी,
नाम सुनते ही काँपे, पूरी यह बस्ती।
सपनों का शहर अब डर से भरा,
एक शख़्स का राज़, सबके दिलों में डरा।
(कोरस – दमदार अंदाज़)
माफ़िया… माफ़िया…!
धारा लग चुकी है, शहर थर्राया,
क़दमों की गूंज से दिल दहलाया।
(धारा 2 – कहानी आगे बढ़ती है)
काले शीशों वाली गाड़ी, रात की रफ़्तार,
आंखों में चमक, हाथों में हथियार।
कानून भी हारा, ख़ामोश खड़ा,
उसके इशारे पर झुका हर बड़ा।
(कोरस दोहराव)
माफ़िया… माफ़िया…!
धारा लग चुकी है, शहर थर्राया,
क़दमों की गूंज से दिल दहलाया।
(धारा 3 – क्लाइमेक्स)
धोखा, साज़िश, खून की किताब,
हर पन्ने पे लिखा डर का हिसाब।
कहानी ये चलती है खून के सहारे,
धारावाहिक बना ये माफ़िया के इशारे।