मन का सफ़र
मन का सफ़र, तन्हा सा क्यों है
दिल की ज़मीं, खामोश अब क्यों है
हर ख्वाब था रंगीन कभी
अब सूनापन उसका मुकाम क्यूँ है
रास्ता कोई चलता नहीं
बात अधूरी सी लगती कहीं
तेरी तलाश में बीते पल
फिर भी तन्हाई अपना घर बन गए
आस की रौशनी, बुझने न दूँगा
हर दर्द को मैं गीत में बाँध लूंगा
मन के सवालों को हल्का सा मुस्करा कर
मुसाफ़िर की तरह आगे बढ़ जाऊँगा
फ़िज़ाओं में तेरा नाम गूँजे
हर सांस में बस तुझे याद करूँ
परछाइयों के उस पार चलकर
अपने मन को फिर से आबाद करूँ