कुछ इस तरह वोह बेरुखी अपनाने लगे हैं
हमे नज़रंदाज़ करके शब्दों को छुपाने लगे हैं
लगता है हाल ए दिल बयां करने लगे हैं कहीं और
तभी तो कृष्णा से नज़रें चुराने लगे हैं
बोलते हैं चले जायेंगे छोड़ कर तुम को इक दिन
जाने किसके बारे सोच के हमको धमकाने लगे हैं
पागल हैं वोह जो न समझ पाएं इश्क हमारा
अपनी सुनहरी आंखों मैं न जाने किसके सपने सजाने लगे हैं
हम तो ठहरे बारह महीनों के दरख़्त
तभी शायद मौसमी पौधों से दिलचस्पी बढ़ाने लगे हैं
कुछ इस तरह वोह बेरुखी अपनाने लगे हैं
हमे नज़रंदाज़ करके शब्दों को छुपाने लगे हैं