राठौर परिवार — वक्त बदलता है
[मुखड़ा]
वक्त बदलता है, वक्त बदलता है,
मेहनत करने वालों का वक्त बदलता है।
कल जिनके घर में मुश्किलों का साया था,
आज उन्हीं के आँगन में खुशियों का उजाला है।
कनहर गाँव की मिट्टी गवाह है उनकी कहानी की,
राठौर परिवार की मेहनत और जवानी की।
पाटपरा गाँव से चलकर जब कनहर में आए,
अपने कर्म और मेहनत से नई पहचान बनाए।
[अंतरा 1 — बंसीधर राठौर]
श्री बंसीधर राठौर थे परिवार के सहारे,
मुश्किल समय में भी हिम्मत नहीं हारे।
पाँच बेटे और दो बेटियाँ थीं उनकी शान,
लक्ष्मी नारायण, जगमोहन, विनोद, मनोज, बीजेन्द्र —
और बिमला-शिमला थीं घर की मुस्कान।
हालात भले ही उस समय कठिन थे,
लेकिन सपने उनके बहुत बड़े थे।
बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी न छोड़ी,
मुश्किल आई तो भी उम्मीद न तोड़ी।
[अंतरा 2 — संघर्ष के दिन]
सुबह होते ही खेतों की ओर निकल जाते,
भाई-बहन सब मिलकर मेहनत में हाथ बँटाते।
कभी खेतों में काम, कभी गाँव की राह,
मेहनत ही थी उनकी सबसे बड़ी चाह।
दूध लेकर गाँव-गाँव जाते थे,
सब्ज़ियाँ लेकर बाजार तक जाते थे।
साइकिल पर सामान, दिल में अरमान,
मेहनत के दम पर चलता था पूरा परिवार।
पैसे कम थे, मगर हौसले हजार थे,
मुश्किल रास्ते थे, मगर सपने शानदार थे।
उस दौर ने सबको एक बात सिखाई—
मेहनत से बड़ी दुनिया में कोई कमाई नहीं भाई।
[अंतरा 3 — समय का बदलाव]
देखो आज वही वक्त कहाँ से कहाँ आ गया,
मेहनत का बीज अब पेड़ बन गया।
बंसीधर जी की मेहनत रंग लाई,
बच्चों ने अपनी-अपनी पहचान बनाई।
लक्ष्मी नारायण राठौर गाँव में दुकान चलाते हैं,
किराने के सामान से लोगों की जरूरतें पूरी कराते हैं।
जिन हाथों ने कभी खेतों में मेहनत की थी,
आज उन्हीं हाथों ने अपनी दुकान खड़ी की।
जगमोहन राठौर शिक्षक कहलाते हैं,
ज्ञान की रोशनी बच्चों तक पहुँचाते हैं।
साथ ही बिल्डिंग मटेरियल का काम भी संभालते हैं,
मेहनत के रास्ते पर आज भी आगे बढ़ते हैं।
[अंतरा 4 — परिवार की पहचान]
विनोद राठौर की अपनी दूध की डेयरी है,
मेहनत से चलती उनकी अपनी दुनिया है।
सीपरी मेन रोड पर उनका मकान है,
मेहनत की कमाई से बना उनका सम्मान है।
मनोज राठौर ने भी नाम कमाया है,
CRPF में ASI का पद पाया है।
जिस परिवार ने मुश्किलों में दिन गुजारे थे,
आज उसी परिवार के बेटे देश की सेवा कर रहे हैं प्यारे।
बीजेन्द्र राठौर ग्वालियर में दुकान चलाते हैं,
अपनी स्टेशनरी की दुकान से पहचान बनाते हैं।
हर भाई ने मेहनत को अपना आधार बनाया,
बंसीधर जी के सपनों को सच करके दिखाया।
[मुखड़ा — दोहराव]
वक्त बदलता है, वक्त बदलता है,
मेहनत करने वालों का वक्त बदलता है।
कल जिनके घर में मुश्किलों का साया था,
आज उन्हीं के आँगन में खुशियों का उजाला है।
कल साइकिल थी, आज अपनी पहचान है,
कल संघर्ष था, आज मेहनत का सम्मान है।
जो परिवार कभी हालातों से लड़ता था,
आज उसी परिवार का नाम गर्व से लिया जाता है।
[अंतिम भावुक पंक्तियाँ]
बंसीधर जी ने जो सपना दिल में सजाया था,
उनके बच्चों ने उसे सच करके दिखाया था।
ये कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं,
ये कहानी है मेहनत, हिम्मत और संस्कार की।
समय चाहे कितना भी बदल जाए,
मेहनत करने वाला कभी पीछे नहीं रह पाए।
राठौर परिवार की यही पहचान रहे—
एकता, मेहनत और संस्कार हमेशा साथ रहे।
वक्त बदलता है…
लेकिन मेहनत की कहानी हमेशा याद रहती है।