मरी मक्खियाँ भी तेल को
बना दें कड़वा, दूषित सा,
वैसे ही थोड़ी-सी भूलें
कर दें बुद्धि को मलिन सा।
बुद्धिमान की राहें सीधी,
मन रहे सही दिशा में;
पर मूर्ख उलटी चाल चले,
खो जाए अपनी भाषा में।
(अंतरा 2)
राहों पर चलता मूर्ख कहे,
“देखो मैं कितना अनजान हूँ।”
क्रोध उठे जब किसी प्रभु का,
तब भी मत तू मैदान छोड़—
धैर्य बड़ा बन रोक सके
पापों की लपटों की दौड़।
(अंतरा 3)
जब मूर्खों को सिंहासन मिलें,
और ज्ञानी हों नीचे धरे;
जब दास घोड़ों पर दौड़ें,
रईस पथों पर पैदल झरे—
तब समझो दुनिया का चक्र
थोड़ा उलटा घूम गया है।
(अंतरा 4)
गड्ढा खोदने वाला ही
गिर जाए अपने जाल में;
दीवार तोड़ने वाला
डस जाए सर्प के लाल में।
जिसका औज़ार कुंद हुआ,
उसे बल देना पड़ता है—
पर बुद्धि की धार लगाकर
काम सहज हो जाता है।
(अंतरा 5)
बुद्धिमान के शब्द अनुग्रह,
मूर्ख के शब्द विनाश;
बात शुरू मूर्खता से हो,
और अंत बने उपहास।
बहुत बातें कर ले कोई,
पर भविष्य किसने जाना?
राहें भूल के थक जाए,
शहर का रास्ता न पहचाना।
(अंतरा 6)
हाय उस देश का हाल जहाँ
बालक जैसा राजा हो;
और प्रभु प्रभात में भोज करें,
धर्मधुरी बन न शासन हो।
धन्य वही भूमि जहाँ
राजा कुल से हो ज्ञानी;
भोज हो समय पर केवल
बल-साहस बढ़ानेवाला पानी।
(अंतरा 7)
आलस छत को तोड़ देता,
सुस्ती घर को चूने दे;
मदिरा हँसी में बहती है,
धन से काम सभी मिलते।
पर मन में भी न कहना कुछ
राजा-रईस के विरुद्ध;
क्योंकि पंखों वाला कोई पक्षी
सुनकर कह दे सारी सृष्ट।