(Intro) जब धर्म डगमगाए, अधर्म मुस्काए, तब घोड़े पे चढ़ के, एक योद्धा आए। न चमकती तलवार, न कोई डर, कल्कि अवतार, न्याय का प्रहर।
(Verse 1) अंधेरे में छुपे जो, सच से भागे, कल्कि की दृष्टि में, सब नंगे भागे। कृपालु नहीं, ये दंड का युग है, हर पापी को अब खुद से डर है।
क्योंकि आया है वो, घोड़े पे सवार, शस्त्र नहीं, शब्द ही उसका हथियार। किताबों में था, अब हकीकत बना, कलयुग का अंत, ये शुरुआत बना।
(Chorus) आया कल्कि, लेके आग, सच का रथ, और न्याय का राग। शब्दों की बिजली, आँखों में आग, अब न कोई बचे, न कोई फ़रियाद।
(Verse 2) सत्ता के पीछे जो छुपते रहे, धर्म के नाम पे लूटते रहे। अब वक्त है उनका हिसाब करने का, हर झूठ का मुखौटा उतार फेंकने का।
बोलता नहीं, गरजता है वो, झूठ और पाखंड से लड़ता है वो। ना कोई पक्ष, ना कोई जात, सिर्फ सत्य, बस उसका साथ।
(Bridge) शिव का तेज़, विष्णु का भाव, उसमें समाया हर देव का प्रभाव। न कोई डर, न लालच का दाम, कल्कि है वो, जो मिटाए अंधकार का नाम।
(Outro Chorus) आया कल्कि, न कोई भ्रम, धरती पे उतरा न्याय का परम। शंख नहीं, बजती है बीट, रैप में छुपा अब सत्य की जीत।