सोच रहा हर शख्स मुझे, मुझे कितना बेहतर जानता है.
मेरा कर्म, मेरा स्वरुप, बस इतना ये पहचानता है.
दो बात हुई, तो तर्क मिले,
दो सवाल हुए, चार अर्थ मिले,
जवाबो में मतभेद हुआ तो, विचारों में भी फ़र्क़ मिले.
ये कैसी संका पाल रहे ये, थोड़ा तो खयाल करें।
अरे जानना है अस्तित्व मेरा तो, मुझसे ये सवाल करें।
मै ना कोई साधक हूँ, ना पंच तत्व का हू ज्ञानी,
पहचान सकू खुद को मै, इतना ना मै अंतरयामी।
तुम सोच रहे जैसा मुझको, उससे बिल्कुल विपरीत सा हूँ।
स्वयम पे कोई श्राप सा, बुरे वक्त के काले रीत सा हूँ ।
मै कोई कोरा कागज था, जो मध्य रात्रि में लिखा गया।
अमावस्या के कृष्ण रंग में, इस ह्रदय को भी मै भीगा गया।
कर्मो पे है पकड़ मेरी, विचारों पर लगाम नहीं।
ना रावण जैसा कर्म मेरा, मानसिकता से मै राम नहीं।
मै विचित्र प्रवृति का मानव हूँ।
न मनुष्य, न पूरा दानव हूँ।
मै नकारात्मक का आदि हूँ।
लोभ, कलेश, द्वेष, बर्बादी हूँ।
मै पाप, घृणा के बीज से उपजा
निकृष्ट, दुष्ट इत्यादि हूँ।
अस्तित्व मेरा बस इतना है, मेरे अनेको चेहरे है।
हर चेहरे पे एक पर्दा है, एक परदे पे हज़ारो पहरे है।
पहरे पे है मायाज़ाल बिछा, जो समुन्द्र से अत्यधिक गहरे है।
तुम समझ सके जितना अबतक, अरे वो मात्र ऊपरी लहरे है।