[Intro]
हाँ, आवाज़ भारी है, ये दास्तान है लम्बी,
उन रास्तों की जिनपे चला, पर मंज़िलें न मिली।
(सुन ज़रा)
[Verse 1 - बचपन और संघर्ष]
जब था छोटा, कंधे पे बोझ, परिवार ने धकेला दूर,
प्यार नहीं, बस प्रेशर की गूँज, अधूरा रहा हर सुर।
कॉलेज का गेट, पर बचपन ग़ायब, जिया नहीं वो पल,
काम, पढ़ाई, हर दिन की मार, सहता रहा मैं हर पल।
दोस्त नहीं, बस पैसों के साथी, रिश्ते सब फ़रेबी थे,
बिना बताए गया, छोड़ गया खाली, सब ख़्वाब रेतीले थे।
सफ़ाई क्या दूँ, जो बात समझते ही नहीं,
हाँ, घर छोड़ा, पर ये दुनिया भी तो राह दिखाती नहीं।
अँधेरे गहरे थे, जब तुमने रोशनी जगाई थी,
उस वक़्त पता न था, तुमने ही ज़िंदगी सँवारी थी।
[Chorus - मेरी पहचान]
ये है मेरी कहानी, हर चोट की ज़ुबानी, अब ये दुनिया सुनेगी,
पीछे हूँ आज, पर मेरा भी दौर आएगा, अब ये दुनिया झुकेगी।
ये सफ़र मैंने किया है ग़ौर, हर मोड़ पे उठके किया शोर,
मेरी ताक़त है ये दर्द, अब ये दिल नहीं डरेगा और!
[Verse 2 - माफ़ी, अलगाव और पछतावा]
वो दिन याद है, जब मैंने दूर जाने को बोला?
**हाँ, ग़लती थी मेरी, मैंने बताया नहीं क्यूँ,**
वो मजबूरी थी, उस वक़्त मैं इतना मजबूर था,
कि झूठ बोला, ताकि तुम आज़ादी से जी सको।
मैंने 3 साल किया कोशिश, एक मौक़ा मिले बस,
पर तुमने न दिया मौक़ा, न ही वक़्त, बस रखा मुझे दूर।
झूठ बोलके कि तू आगे बढ़ गई हो, पर पता है मुझे,
तुम आज भी वहीं हो, बदली नहीं, बस चुप खड़ी हो।
अब हम इतने आगे बढ़ गए हैं, कि पीछे भी नहीं जा सकते,
वो मंज़िलें बदल गईं, इस सच को दिल से नकार नहीं सकते।
**[Geet 2 Reference]**
आठ साल बाद, फिर से मिला दर्द, वो हँसी, वो बात, सब रह गए अधूरे,
मेरा हर एक पल, अब विखंडित हुआ है, ये हृदय आज भी ज़ख़्मी है मेरा।
अधूरा सफ़र, अधूरी सी रातें, क्यूँ इश्क़ में हमेशा ऐसा होता है?
जो अपना हो, वो ही दूर रोता है?
[Bridge - सवाल और आख़िरी गुज़ारिश]
रात घनी है, शहर सो गया है, पर ये दिल अभी तक जागा हुआ है,
मैं वहीं खड़ा हूँ, जहाँ तुम थी आख़िरी, अब ये कसमें नहीं निभाता रहा हूँ।
क्यूँ आया लौट कर, वो बीता हुआ पल, जब होंठों पे थी बस एक अधूरी ग़ज़ल?
पुरानी किताब का, बंद पन्ना हो तुम, जिसे खोलूँ तो, बस आँख भर आती है।
आज आख़िरी बार ज़ोर से कहता हूँ,
अगर मुमकिन हो, तो वो वक़्त दे दो,
**शायद कभी हम मिलें, तो पुरानी बातें निकलें, और उन्हीं बातों को सोच के हम फिर से मुस्कुरा दें।**
बस एक आख़िरी मुलाक़ात, जहाँ न हो कोई शिकायत, न कोई तकरार।
[Outro]
जीना पड़ रहा है... हाँ, मैं जी रहा हूँ...
बिना मंज़िल के, बस सफ़र निभा रहा हूँ...
पर अब दर्द नहीं, ये मेरी ताक़त बन गई है...
(Mic Drop Sound)