आनन्द परम्परा की जय हो, राजराजेश्वरी की जयकार।
गुरु-चरणों में शीश झुकाएं, मिले ज्ञान का सार।
राजराजेश्वरी काली, तू आनन्द की खान।
पुष्प-रत्न से सजी मैया, दे भक्तों को वरदान।
करुणा-कृपा-दया की मूरत, तेरा रूप आनन्दमय है।
राजराजेश्वरी माँ का, हर पल हमको वरदान मिले।
सिद्धेश्वर महादेव और हनुमान की कृपा, सदा हम पर बनी रहे।
शंकराचार्य जी का ज्ञान मिले, गुरु-मार्ग से मोक्ष मिले।
राजेश्वरांद जी गुरुवर, तप और ज्ञान की शान।
उन्हीं से आनन्द-परम्परा का, हुआ जग में सम्मान।
राजेश्वरांद महाराज ने कठिन तप से, मैया को दर्शन हेतु बुलाया,
दिव्य संकल्प लिया था, आनन्द-मार्ग चलाने का।
अज्ञान का तिमिर मिटाकर, ज्ञान का बीज बोया,
मैय्या की कृपा से, हर शिष्य को सत्य-मार्ग दिखलाया।
राजराजेश्वरी माँ का प्रेम, कैसा हो, यह जग को दिखलाया,
गुरु ने अपना हर क्षण, माँ के चरणों को अर्पण किया।
सिद्धेश्वरानंद जी ने गुरु की, हर आज्ञा निभाई।
सिद्ध-आश्रम की नींव रखकर, आनन्द की ज्योति जगमगाई।
गुरु के आदेशों को ही, उन्होंने धर्म माना, कर्म किया।
सिद्ध आश्रम बसाया, जहाँ मिलता आनन्द खज़ाना।
राजेश्वरांद के संकल्प को पूर्ण करने का आधार बनाया,
गुरु-शिष्य प्रेम का अनुपम बंधन उन्होंने दिखलाया।
उनकी सेवा और समर्पण की कथा, हर शिष्य को प्रेरणा देती है,
जीवन के हर मोड़ पर हमको, उनकी करुणा घेरे रहती है।
सच्चिदानंद जी ने गुरु-द्वय का, संकल्प पूरा किया।
आनन्द परम्परा की शक्ति को, जग से परिचय दिया।
धन्य हैं सच्चिदानंद जी, जिन्होंने गद्दी को संभाला।
गुरु-द्वय का संकल्प-पुष्प, अपनी सेवा से खिलाया।
असंख्य काज किए जग कल्याण के, स्वयं को न्योछावर कर दिया,
इस परम्परा के गुरुओं की पहचान, जग को आपने ही कराई।
उनकी दूरदर्शिता से ही, यह ज्ञान घर-घर पहुँचा है,
सच्चाई के मार्ग पर चलने का, संकल्प उनसे ही सीखा है।
राजेश्वर, सिद्धेश्वर, सच्चिदानंद, त्रयी ने कल्याण किया।
आनन्द परम्परा का दीप, सब शिष्यों को दान दिया।
एक ने संकल्प लिया, दूजे ने आधार दिया, तीजे ने किया पूरा।
इन तीनों की शक्ति से ही, मार्ग हुआ सुन्दर और अधूरा नहीं।
ये तीनों ही गुरुजन हमारे, माँ काली का वरदान हैं,
इनकी ज्योति से ही रोशन, इस परम्परा की शान हैं।
गुरु-बल से ही आनन्द-परम्परा का बीज तबसे फला,
मैया की भक्ति का पुष्प, सबके हृदय में खिला।
प्रेमानंद जी के हृदय में, बस प्रेम का ही वास।
गुरु-सेवा से ही उन्होंने, ईश्वर को पाया पास।
प्रेमानंद जी ने प्रेम-भक्ति का मार्ग, हर शिष्य को दिखलाया।
प्रेम ही ईश्वर, प्रेम ही सत्य, यह ज्ञान हमें समझाया।
प्रेम के धागे से ही गुरु और ईश्वर का बंधन है,
उनकी शिक्षा से ही मिलता, आनन्द और वंदन है।
उनके प्रेम की वर्षा से, हर मन का पाप धुल जाता है,
गुरु-चरणों में समर्पण का सच्चा अर्थ, उनसे ही मिल पाता है।
माधवानंद जी ने सेवा और भजन को, अपना मार्ग बनाया।
कीर्तन की वाणी से, मैया को पास बुलाया।
सेवा को ही धर्म मानकर, गुरु-सेवा में जीवन दिया।
भजन-कीर्तन की ध्वनि से, हर शिष्य का कल्याण किया।
ईश्वर की भक्ति में लीन रहकर, ध्यान को गहरा किया,
सरल मार्ग से सबको, परमात्मा का ज्ञान दिया।
सेवा ही सच्ची शक्ति है, यह पाठ उन्होंने सिखाया,
गुरु-कृपा पाने का मार्ग, सबको सहज ही दिखलाया।