वो नूर-ए-अज़ल, नूर-ए-खुदा, ख़ैर-उल-वरा तुम हो
हर ग़म के मदावा, बे-कस की सदा तुम हो
तारीक दिलों में उजाला तुम्हारा है
बीमार लबों पे सहारा तुम्हारा है
जब कोई न था मेरा, तब तुम ने संभाला है
इस बंदा-ए-आसी को हर दम नवाज़ा है
रहमत का खज़ाना, बख्शिश का वसीला हो
तुम श़ाफिअ-ए-महशर हो, तुम ही तो वसीला हो
तुम श़ेहर-ए-मदीना की रौनक हो, जान-ए-जां
तुम बाइस-ए-कौन ओ मकां, सैय्यद-ए-कौन ओ मकां
तुम पर हो करोड़ों दरूद और सलाम-ए-बे पायां
हर सांस में जारी रहे ये ज़िक्र-ए-जानां
सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम
सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम