(Inspired by Arijit Singh songs, emotional)
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[इंट्रो – धीमा पियानो, हल्की बूँदें, धीमी सांसें]
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कुछ बदल सा गया हूँ मैं माँ...
ना वो हँसी बची, ना वो मैं रहा...
इस जॉब की दौड़ में… कहीं थक सा गया हूँ माँ…
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[अंतरा 1 – Soft Melody with Pain]
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हर सुबह metro की भीड़ में खुद को ढूँढता हूँ,
तेरे हाथों की चाय अब ख्वाबों में ही चखता हूँ।
लाखों के बीच भी, मैं आज तन्हा हूँ,
चेहरे बहुत हैं, पर कोई अपना कहाँ है माँ?
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दफ़्तर की कुर्सी से घर की बातें दूर हो गईं,
वो terrace, वो stories… अब अधूरी यादें हो गईं।
कभी जो दौड़ता था खिलखिला के,
अब खामोश चल रहा हूँ, मुस्कुरा के।
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[कोरस – भावुकता का तूफ़ान]
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कुछ बदल सा गया हूँ मैं माँ,
ना वो बचपन, ना वो धड़कन,
तेरी गोद की गर्मी आज भी रोती है,
ये success की दुनिया थोड़ी ठंडी सी लगती है।
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जो दोस्त थे, वो पीछे छूट गए,
रिश्तों के धागे धीरे-धीरे टूट गए।
कभी जो बेफिक्र था तेरे आँचल में,
अब हर साँस भी समझौते में पलती है माँ।
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[अंतरा 2 – यादों का कोना खुलता है]
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पापा की डाँट, तेरी मीठी झिड़की,
अब याद आती है हर सर्द सुबह की।
वो बारिश में भीगना, माटी की ख़ुशबू,
अब AC ऑफिस में वो एहसास नहीं तू।
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माँ, मैं भूल गया हूँ कैसे खुल के हँसते थे,
कैसे दोस्त बिना वजह घंटों तक मिलते थे।
अब time है, deadlines हैं, meetings की लिस्ट,
पर वो free वाला “मैं” अब कहीं खो गया है, it's missed.
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[कोरस दोहराव – अब आँसू के साथ गूंजता है]
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कुछ बदल सा गया हूँ मैं माँ,
जो मैं था, शायद अब वो नहीं रहा।
पर जब भी तेरी lullaby याद आती है,
दिल फिर बच्चा बन के रोना चाहता है।
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ये शहर तेज़ है, पर रिश्ते सुस्त हैं,
यहाँ लोग नहीं, profiles दोस्त हैं।
माँ, तू बस इतना जान ले —
तेरे बिना सब कुछ है… पर सुकून नहीं है।
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[आउट्रो – धीमा fade, एक टेलीफोन टोन या ट्रेन की सीटी के साथ]
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कुछ बदल सा गया हूँ मैं माँ…
पर जो भी हूँ…
तेरे बिना अधूरा हूँ।
– दीपक गोस्वामी
अब भी वही बेटा… भीड़ में गुम… पर तुझसे जुड़ा हुआ।
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