जमाना देखा सारा है, सबका सहारा छोड़ चला,
ये दिल किसी का ना हुआ, सफ़र में है ये बंजारा।
कैसे कहूँ तेरे बिन, जिंदगी कैसी लगती है,
साँसों के हर क़दम तुझसे जुड़ते हैं,
दिल मेरा वहीं है जहाँ तू रहती है।
नींद खुली भी नहीं कि धूप ढल गई,
पांव उठे ही थे कि उम्र फिसल गई।
पात पात झड़ गए, शाख शाख जल गई,
चाह निकल सकी मगर — ज़िंदगी निकल गई।
ये क्या हुआ… कैसे हुआ… कब हुआ… क्यों हुआ?
जब हुआ, तो बस यूं ही हुआ…
मेरे भी कुछ किस्से हैं, मेरी भी कहानी है,
ग़ैर तो ग़ैर हैं, ग़ैरों से गिला है,
पर अपनों की मेहरबानी है…
अपने तो अपने हैं, पर मिला क्या अपनों से?
वो दूरियों के काबिल निकले,
जिन्होंने नज़दीकियों की क़दर न की।
कारवाँ गुज़र गया धूल उठती रही,
हम देखते रहे, वक़्त छलकता रहा।
दोपहर तक बाज़ार सारा झूठ बिकता रहा,
और मैं सच को लेकर शाम तक बैठा रहा।