(अंतरा 1)
चल पड़ा हूँ मैं अकेला,
भीड़ में भी कुछ अलग सा।
हर कदम पे है सवाल,
पर जवाब हूं मैं खुद सा।
कभी टूटे, कभी जुड़ गए,
सपने फिर भी चल पड़े।
हर ठोकर ने ये सिखाया,
जो गिरा है वही तो चढ़े।
(कोरस)
मेरे रास्ते, मेरी पहचान,
ना किसी से कम, ना किसी का एहसान।
जो खुद पे रखे भरोसा यहाँ,
वही बनाता है अपनी उड़ान।
मैं चलूँगा जब तक साँसे हैं,
मैं बनूँगा जब तक आसें हैं।
मेरे ख्वाबों का आसमान,
बस मेरा है ये जहान।
(अंतरा 2)
ना किसी के जैसा होना है,
ना किसी को पीछे छोड़ा है।
जो बना है दिल से साथी,
उसका साथ ही सच्चा तोहफा है।
माँ की दुआ, बापू की छाया,
दोस्तों की हंसी, बहना की माया।
इन रिश्तों के रंगों से भरकर,
मैंने अपनी तक़दीर बनाई।
(ब्रिज)
जिन्होंने कहा तू ना कर पाएगा,
वो आज भी वहीं खड़े हैं।
और मैं चल पड़ा उस रौशनी की ओर,
जहाँ सपने मेरे