धूल उठी जीवन पथ पर
कंधों पे घर संसार
ऋण, जिम्मेदारी, टूटी नींदें
फिर भी भीतर अंगार
भटके मन ने माया ओढ़ी
नाम, संबंध, स्वप्न में खोया
एक विरह ने सत्य दिखाया
जो था अपना वही ना हुआ
अलख निरंजन आदेश
मन के भीतर जागे देश
काल कर्म संशय भस्म
जले अहंकार विशेष
आदेश... आदेश...
रातों जागे लोहे जैसा
तन भारी पर दृष्टि तेज
टूटी आशा, सूखे रिश्ते
फिर भी भीतर अग्नि शेष
ना मैं भय हूँ ना ही हार
ना अपमान ना व्यवहार
मैं चलती श्वास का जोगी
मैं भीतर का हुंकार
शब्द सांचा पिंड काचा
सत्य ही गुरु की वाचा
जो खोजे जग में सहारा
उसका टूटे हर किनारा
अलख निरंजन आदेश
कर्म बने अब मेरा वेश
भोग मोह सब भस्म स्वाहा
जगे भीतर शिव संदेश
भस्म लगे संकल्पों पर
काया तपे श्रम की आग
रोज गिरे फिर रोज उठे
यही साधक का सुहाग
ना तुलना ना शिकायत
ना अतीत का अब क्लेश
लोभ मोह सब त्याग करूँ
बने अनुशासन परिवेश
गोरख बोले भीतर सुन
भाग्य नहीं बस कर्म चुन
जो खुद को जीत सकेगा
काल भी उससे डरेगा
आदेश... आदेश...
अलख निरंजन आदेश...
मैं ना देह मैं ना नाम
ना असफलता ना इल्जाम
मैं प्रयासों की ज्वाला
मैं श्रम रूपी श्रीराम
जहाँ जहाँ मन डगमग हो
वहाँ स्मरण यह मंत्र
स्थिर श्वास, स्थिर दृष्टि
भीतर जागे तंत्र
शब्द सांचा पिंड काचा
ईश्वर वाचा सत्यराचा
जो कहा वो करके दिखा
यही जोगी की परिभाषा
अलख निरंजन...
आदेश... आदेश...