पालखी निकली है राजा की,
पालखी निकली है राजा की,
चलो गणेश नगर में…
पालखी निकली है राजा की,
चलो गणेश नगर में…
रामसनेही का राजा मेरा,
सजा है भव्य रूप में।
राजा बैठा है शान से,
भक्त नाचते हैं उमंग में।।
धर्म की डोरी थामकर,
सब कुछ भूलकर,
कंधा लगाया है पालखी को,
राजा बैठा है झूमते हुए।।
वक्रतुंड का बुलावा आया,
और उसने खुशी से स्वीकार किया।
गणेश नगर हुआ प्रकाशित,
रामसनेही के राजा की आभा से।।
मोदक और लड्डुओं का भोग रखा है थाल में,
चांदी के राजा की भव्यता में
राजा विराजेगा।।
राजा सिंहासन पर शोभता है,
मन का चंद्रमा भी शर्मा जाता है।
सिर पर मुकुट लहराता है,
जैसे मोर नाचता हो।।
स्नान कराओ इस राजा को,
दही-दूध रखा है मटके में।
रामसनेही का राजा मेरा,
सजा है भव्य रूप में।।
महादेव का एक वरदान,
और ज्ञान वही तेजस्वी।
तेरा ऐसा वरदान है,
तुझको पालखी में साजाया।।
रामसनेही का राजा,
कर पूर्ण हर वचन।
जहाँ से ज्ञान आया,
वह मूल पीठ को प्राप्त हुआ।।
ऐसा महादेव ने कहा —
मेरा कार्य पूर्ण हुआ।
शंकर के अवतार बाप्पा,
रामसनेही का साक्षात राजा।।
मेरा सजा है भव्य रूप में…
पालखी निकली है राजा की…
चलो गणेश नगर में…।।
[Female Vocal]