वो भी तो जीते है, सांसे उनकी भी है ,
आंखों में डर सा है, खामोश सिसकी सी है।
बोल नही सकते,पर दर्द हर अंग में है,
हमारी दुनिया में, खामोश चीखे है।
ना खाल चाहिए
ना मांस की वो भूख,
ये किसी इंसानियत
जो छीन ले सब सुख।
जंगल भी उनका है ,
धरती है सांझी,
फिर क्यों बनते हम,
उनके लिए पाजी।
माटी कहे कुमार से,
तु क्यों रौंदे मोय,
एक दिन ऐसा आयेगा,
में रौंदूंगी तोय,