रूख़्सती के वक़्त दिल में ,एक कशिश सी रह गई।
दिल को समझया बहुत,पर एक ख़लिश सी रह गई।।
नीली आँखों में ना जाने , कितने गहरे राज़ थे,
तह तक जाते मगर , रिश्तो में रंजिश हो गई ।
ज़हनों-दिल बेज़ार से रहते हैं , जाने अब भी क्यों ?
महके गुलशन की वो ख्वाहिश , तार - तार हो गई।
शिकवे-गिले ! दिल के हम,करते किसी से कैसे यार,
बेसुध सी चाहत जाने कब ? जज़्बातों से खो गई।
समझाते हैं “विवश” हम, ख्वाहिश-ए-दिल को मगर,
दिल की हसरत,दिल के कोने, में कहीं जा सो गई।